yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat |yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām ||
यज्ञ, दान और तप के कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं; उन्हें करना ही चाहिए। यज्ञ, दान और तप निश्चय ही विवेकी लोगों को पवित्र करने वाले हैं।
व्याख्या
अर्जुन के त्याग संबंधी प्रश्न के उत्तर में कृष्ण अपना निश्चित मत बताना शुरू करते हैं। यज्ञ, दान और तप कर्तव्य हैं, इन्हें छोड़ना नहीं चाहिए। वे इन्हें मनीषियों, यानी विवेकपूर्वक कर्म करने वालों, के लिए पवित्र करने वाला कहते हैं। अगले श्लोक में जुड़ता है कि इन्हें फल की आसक्ति छोड़कर करना चाहिए।