तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
tacca saṃsmṛtya saṃsmṛtya rūpamatyadbhutaṃ hareḥ |vismayo me mahān rājan hṛṣyāmi ca punaḥ punaḥ ||
और हरि के उस अत्यंत अद्भुत रूप को बार-बार याद करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है, और मैं बार-बार हर्ष से भर उठता हूँ।
व्याख्या
संजय राजा धृतराष्ट्र को युद्ध का वृत्तांत सुनाते हुए अपनी बात समाप्त कर रहे हैं। "हरि का रूप" कृष्ण का वह विश्वरूप है जो उन्होंने ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को दिखाया था। संजय कहते हैं कि उसे याद करते ही उनके मन में विस्मय और आनंद भर जाता है।