जो आरंभ में विष जैसा लगता है, पर परिणाम में अमृत के समान होता है — वह सुख सात्त्विक कहा गया है; वह अपने आत्मस्वरूप की ओर लगी बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है।
व्याख्या
कृष्ण सुख के तीन प्रकार बता रहे हैं, और यहाँ पहला, सात्त्विक सुख है, जो सत्त्व (शुद्धता और संतुलन के गुण) से जुड़ा है। शुरू में अनुशासन के कारण यह कठिन और कड़वा लगता है, पर अंत में स्थायी आनंद देता है। इसका स्रोत आत्मा से जुड़ी शांत, निर्मल बुद्धि है; 'आत्मबुद्धि' को कुछ व्याख्याकार अपनी ही बुद्धि की निर्मलता मानते हैं, तो कुछ आत्मा को जानने वाली बुद्धि की निर्मलता।