श्रीकृष्ण
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥
muktasaṅgo'nahaṃvādī dhṛtyutsāhasamanvitaḥ | siddhyasiddhyornirvikāraḥ kartā sāttvika ucyate ||
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार से भरी बातें नहीं करता, धैर्य और उत्साह से युक्त है, और सफलता तथा विफलता में विचलित नहीं होता—वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या श्रीकृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार कर्ता के तीन प्रकार बता रहे हैं। इस श्लोक में सात्त्विक कर्ता का वर्णन है: वह आसक्ति (सङ्ग) से मुक्त, अहंकार-रहित, धैर्यवान और उत्साही होता है, तथा सिद्धि-असिद्धि में समभाव रखता है। यहाँ कर्म से अधिक कर्ता के भीतरी भाव पर ज़ोर है।
पिछला श्लोक 18.25 अध्याय 18 · संन्यास से मोक्ष अगला श्लोक 18.27
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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