सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥
sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet |sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgnirivāvṛtāḥ ||
हे कुन्तीपुत्र, अपने सहज कर्म में दोष हो, तब भी उसे नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि सभी कार्य किसी न किसी दोष से वैसे ही ढके रहते हैं, जैसे आग धुएँ से ढकी रहती है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को अपने स्वभाव और स्वधर्म के अनुसार कर्म करने की सीख आगे बढ़ाते हैं। जैसे आग के साथ धुआँ रहता है, वैसे हर कर्म में कुछ न कुछ कमी रहती है, इसलिए केवल दोष के कारण अपना स्वाभाविक कर्म छोड़ना उचित नहीं। "सहज" का अर्थ परंपराओं में अलग-अलग लिया गया है: कुछ इसे जन्म से मिले वर्ण का कर्तव्य मानती हैं, तो कुछ भीतरी प्रकृति के अनुकूल कर्म।