अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥
aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam |bhavatyatyāgināṃ pretya na tu saṃnyāsināṃ kvacit ||
अनचाहा, मनचाहा और मिला-जुला — कर्म का फल तीन प्रकार का होता है। यह फल मृत्यु के बाद उन लोगों को मिलता है जिन्होंने त्याग नहीं किया, पर संन्यासियों को कभी नहीं मिलता।
व्याख्या
कृष्ण त्याग और संन्यास पर अपना उपदेश जारी रखते हैं। वे कहते हैं कि कर्म के तीन प्रकार के फल होते हैं: अनिष्ट, इष्ट और मिश्र। जो फल से आसक्त रहते हैं उन्हें ये फल मिलते हैं, पर जिन्होंने यह आसक्ति छोड़ दी है वे इनसे बँधते नहीं। 'प्रेत्य' से कुछ परंपराएँ पुनर्जन्म समझती हैं और कुछ केवल बाद में मिलने वाला फल; इसी तरह 'संन्यासी' को कुछ औपचारिक संन्यासी मानती हैं और कुछ कर्मफल का त्याग करने वाला कोई भी साधक।