न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
na ca tasmānmanuṣyeṣu kaścinme priyakṛttamaḥ |bhavitā na ca me tasmādanyaḥ priyataro bhuvi ||
मनुष्यों में उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और इस पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय मुझे दूसरा कोई कभी होगा भी नहीं।
व्याख्या
पिछले श्लोक की बात को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण कहते हैं कि जो इस परम रहस्य को उनके भक्तों तक पहुँचाता है, मनुष्यों में उससे बढ़कर उनका प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और भविष्य में भी पृथ्वी पर उससे अधिक प्रिय उन्हें कोई नहीं होगा। यह गीता के उपदेश को योग्य श्रोताओं तक पहुँचाने की सबसे ऊँची प्रशंसा है। अगले श्लोक में वे इस संवाद के अध्ययन के फल की बात करते हैं।