जो कर्ता आसक्ति से भरा हो, कर्म के फल को पाने की चाह रखता हो, लोभी हो, दूसरों को पीड़ा देने के स्वभाव वाला और अशुद्ध हो, तथा हर्ष और शोक से घिरा रहता हो, वह राजस कहा गया है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण कर्ता के तीन प्रकार बता रहे हैं, जो प्रकृति के तीन गुणों से बनते हैं। पिछले श्लोक में सात्त्विक कर्ता था; यहाँ रजोगुण से प्रेरित राजस कर्ता का वर्णन है। वह आसक्त (राग) होता है, फल की लालसा रखता है, लोभी, हिंसक प्रवृत्ति का और अशुचि (आंतरिक या नैतिक शुद्धता की कमी) वाला होता है। सफलता-असफलता पर उसका मन हर्ष और शोक में डोलता रहता है।