अपना धर्म, भले ही उसमें कमी हो, दूसरे के भलीभाँति निभाए गए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुसार निश्चित कर्म करने वाले मनुष्य को पाप नहीं लगता।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि हर व्यक्ति का कर्म उसके स्वभाव और तीन गुणों के अनुसार तय होता है। वे कहते हैं कि अपना धर्म (स्वधर्म) अधूरा हो तब भी दूसरे के कुशलता से किए गए धर्म से बेहतर है। स्वभाव के अनुकूल कर्म करने से पाप (किल्बिष) नहीं लगता। परंपराओं में इस पर मतभेद है कि यह स्वभाव मुख्यतः जन्म से तय होता है या व्यक्ति की भीतरी प्रवृत्ति और गुणों से।