ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ |procyate guṇasaṃkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi ||
ज्ञान, कर्म और कर्ता — गुणों के विवेचन में गुणों के भेद के अनुसार इन तीनों के तीन-तीन ही प्रकार बताए गए हैं। उन्हें भी तुम यथार्थ रूप में सुनो।
व्याख्या
कृष्ण अब कर्म के अंगों का वर्गीकरण शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि ज्ञान, कर्म और कर्ता — तीनों के तीन-तीन भेद हैं, जो प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) में से प्रबल गुण पर निर्भर करते हैं। 'गुणसंख्यान' को कुछ परंपराएँ सांख्य-शास्त्र का संकेत मानती हैं, तो कुछ इसे केवल गुणों की गणना या विवेचन की पद्धति मानती हैं।