जो व्यक्ति किसी कर्म को केवल "यह दुःखदायी है" सोचकर, या शरीर को कष्ट होने के भय से छोड़ देता है, वह राजसी त्याग करता है, और त्याग का फल उसे नहीं मिलता।
व्याख्या
पिछले श्लोक में तामसिक त्याग बताने के बाद कृष्ण अर्जुन को अब राजसिक (रजोगुण से प्रेरित, बेचैन) त्याग समझा रहे हैं। जब कोई कर्तव्य केवल कठिन या थकाने वाला लगने पर छोड़ दिया जाए, तो वह किसी सच्ची समझ से नहीं, बल्कि सुविधा और भय से प्रेरित होता है। ऐसे त्याग से वह मुक्ति और शांति नहीं मिलती जो सच्चे त्याग का फल है।