sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ |svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu ||
अपने-अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य पूर्ण सिद्धि प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा रहकर वह जिस प्रकार सिद्धि पाता है, वह सुनो।
व्याख्या
पिछले श्लोक में चारों वर्णों के स्वभाव से उपजे कर्म गिनाने के बाद कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अपने कर्म में निष्ठा से लगा व्यक्ति संसिद्धि, यानी जीवन की पूर्णता, पाता है। फिर वे यह समझाने का वचन देते हैं कि यह सिद्धि कैसे मिलती है, जिसका उत्तर अगले श्लोक में है। "स्वकर्म" को परंपरागत टीकाकार मुख्यतः वर्ण के अनुसार निर्धारित कर्तव्य मानते हैं, जबकि कई आधुनिक पाठक इसे व्यक्ति के अपने स्वभाव और योग्यता के अनुकूल कर्म के रूप में पढ़ते हैं।