बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च ।शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
buddhyā viśuddhayā yukto dhṛtyā''tmānaṃ niyamya ca |śabdādīn viṣayāṃstyaktvā rāgadveṣau vyudasya ca ||
शुद्ध बुद्धि से युक्त होकर, धैर्य से अपने आप को संयमित करके, शब्द आदि इन्द्रिय-विषयों को त्यागकर और राग तथा द्वेष को दूर हटाकर…
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि सिद्धि पाया हुआ मनुष्य ब्रह्म (परम सत्य) को कैसे पाता है; यह वर्णन यहाँ से शुरू होकर अगले दो श्लोकों तक चलता है। इस श्लोक में पहले गुण गिनाए गए हैं: शुद्ध बुद्धि, दृढ़ धैर्य (धृति) से आत्म-संयम, शब्द जैसे विषयों से विमुख होना, तथा राग और द्वेष को छोड़ना। विषयों के 'त्याग' को कुछ परंपराएँ बाहरी त्याग मानती हैं और कुछ उनके प्रति लालसा से मुक्ति; श्लोक स्वयं इसका निर्णय नहीं करता।