अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥
adhyeṣyate ca ya imaṃ dharmyaṃ saṃvādamāvayoḥ |jñānayajñena tenāhamiṣṭaḥ syāmiti me matiḥ ||
और जो कोई हम दोनों के इस धर्ममय संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञान-यज्ञ से पूजित होऊँगा, ऐसा मेरा मत है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से अपने समापन-वचनों में उन लोगों की बात करते हैं जो गीता की शिक्षा का अध्ययन करेंगे। वे कहते हैं कि धर्म (सदाचार) से युक्त इस संवाद का पाठ और अध्ययन स्वयं एक ज्ञान-यज्ञ है, यानी कर्मकांड नहीं बल्कि समझ के द्वारा की गई उपासना। कुछ परंपराएँ इसमें भक्ति पर और कुछ ज्ञान पर बल देती हैं, पर सभी इसे उच्च कोटि की उपासना मानती हैं।