यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
yayā dharmamadharmaṃ ca kāryaṃ cākāryameva ca |ayathāvatprajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī ||
हे पार्थ, जिस बुद्धि से मनुष्य धर्म और अधर्म को, तथा करने योग्य और न करने योग्य कर्म को ठीक-ठीक नहीं समझता, वह बुद्धि राजसी है।
व्याख्या
कृष्ण प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार बुद्धि के तीन प्रकार बता रहे हैं। पिछले श्लोक में स्वच्छ सात्त्विक बुद्धि का वर्णन था। यहाँ राजसी बुद्धि वह है जो धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य को यथार्थ रूप में नहीं देख पाती, क्योंकि इच्छा और चंचलता उसके विवेक को धुंधला कर देती हैं।