यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
yadagre cānubandhe ca sukhaṃ mohanamātmanaḥ |nidrālasyapramādotthaṃ tattāmasamudāhṛtam ||
जो सुख आरम्भ में भी और परिणाम में भी आत्मा को मोह में डाल देता है, और जो नींद, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, वह तामस सुख कहा गया है।
व्याख्या
कृष्ण सुख के तीन प्रकार बता रहे हैं, और सात्त्विक तथा राजस सुख के बाद यहाँ तामस सुख का वर्णन करते हैं। यह सुख शुरू से अंत तक मोह में डालने वाला है और नींद, आलस्य तथा प्रमाद (लापरवाही) से पैदा होता है। तमस् वह गुण है, यानी प्रकृति का वह तत्त्व, जो जड़ता और अज्ञान से जुड़ा है।