परन्तु हे अर्जुन, जिस धृति से मनुष्य आसक्ति के साथ धर्म, काम और अर्थ को थामे रहता है और उनके फल की कामना करता है, हे पार्थ, वह धृति राजसी है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ तीन प्रकार की धृति (दृढ़ता, जो मनुष्य को अपने लक्ष्यों पर टिकाए रखती है) बता रहे हैं। यह राजसी धृति है, जो धर्म, काम (सुख) और अर्थ (धन) इन तीन सांसारिक लक्ष्यों से जुड़ी है। ऐसा व्यक्ति आसक्ति (प्रसङ्ग) और फल की इच्छा से इन्हें थामे रहता है। फल की चाह से चलने के कारण यह पिछले श्लोक की स्थिर सात्त्विक धृति से भिन्न है।