अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् ।मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
anubandhaṃ kṣayaṃ hiṃsāmanapekṣya ca pauruṣam |mohādārabhyate karma yattattāmasamucyate ||
जो कर्म मोह के कारण शुरू किया जाता है, जिसमें न परिणाम का, न होने वाली हानि का, न दूसरों को पहुँचने वाली पीड़ा का और न अपनी सामर्थ्य का विचार किया जाता है, वह तामस कहलाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार कर्म के तीन प्रकार बता रहे हैं। इस श्लोक में तामस कर्म है, जो मोह से उपजता है और परिणाम (अनुबन्ध), हानि (क्षय), हिंसा तथा अपनी सामर्थ्य (पौरुष) की उपेक्षा करता है। 'पौरुष' को कई व्याख्याकार अपनी क्षमता मानते हैं, जबकि कुछ इसे सामान्य रूप से मानवीय प्रयत्न या सामर्थ्य के अर्थ में लेते हैं।