जो कर्म किसी कामना से किए जाते हैं, उनके त्याग को ज्ञानीजन संन्यास कहते हैं। सभी कर्मों के फल को छोड़ देने को विवेकी लोग त्याग कहते हैं।
व्याख्या
अर्जुन ने संन्यास और त्याग का भेद पूछा था, और कृष्ण यहाँ उत्तर देना शुरू करते हैं। वे दोनों शब्दों की परिभाषा देते हैं: ज्ञानी लोग कामना से किए जाने वाले कर्मों को छोड़ देने को संन्यास कहते हैं, और विवेकी लोग सब कर्मों के फल को छोड़ देने को त्याग कहते हैं। परंपराएँ इन्हें अलग-अलग मार्ग भी मानती हैं और एक ही भीतरी अनासक्ति के दो रूप भी।