जिससे सभी प्राणियों की उत्पत्ति और गतिविधि होती है और जिसके द्वारा यह सब कुछ व्याप्त है, उसकी अपने कर्म के द्वारा पूजा करके मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है।
व्याख्या
कृष्ण बता रहे हैं कि अपने कर्तव्य-कर्म में लगा मनुष्य सिद्धि कैसे पाता है। जो सब प्राणियों का मूल है और सबमें व्याप्त है, उसकी पूजा अपने कर्म (स्वकर्म) से की जा सकती है। इस भाव से किया गया कर्म केवल आजीविका नहीं, पूजा बन जाता है। व्याख्याकार “उस” को साकार ईश्वर मानते हैं या सर्वव्यापी ब्रह्म, इस पर मतभेद है, पर कर्म को अर्पण करने की बात पर सब सहमत हैं।