ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati |samaḥ sarveṣu bhūteṣu madbhaktiṃ labhate parām ||
ब्रह्म-भाव को प्राप्त, प्रसन्न मन वाला व्यक्ति न शोक करता है, न कुछ चाहता है। सब प्राणियों के प्रति समभाव रखने वाला वह मेरी परम भक्ति को पा लेता है।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ाते हैं, जिसने अहंकार, क्रोध और संग्रह की प्रवृत्ति छोड़ दी है। ब्रह्म (परम सत्य) में स्थित ऐसा व्यक्ति शांत रहता है, शोक और कामना (काङ्क्षा) से मुक्त होता है और सबको समान देखता है। अद्वैत परंपरा परा भक्ति को ज्ञान की पराकाष्ठा मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे मोक्ष से भी आगे कृष्ण के प्रति प्रेम समझती हैं।