सर्वगुह्यतमं भूयः श्रृणु मे परमं वचः ।इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
sarvaguhyatamaṃ bhūyaḥ śrṛṇu me paramaṃ vacaḥ |iṣṭo'si me dṛḍhamiti tato vakṣyāmi te hitam ||
सबसे अधिक गुप्त मेरा परम वचन तुम फिर एक बार सुनो। तुम मुझे अत्यंत प्रिय हो, इसीलिए मैं तुम्हें वह बताऊँगा जो तुम्हारे लिए हितकर है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण अर्जुन को विचार करके स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता दे चुके हैं। अब वे सबसे गुप्त और अंतिम उपदेश देने जा रहे हैं, और कहते हैं कि यह अर्जुन के प्रति स्नेह और उसके हित के लिए है। वह उपदेश अगले श्लोक में आता है।