खेती, गोपालन और व्यापार वैश्य का स्वभाव से उत्पन्न कर्म है, और सेवा के रूप में किया जाने वाला कर्म शूद्र का भी स्वभाव से उत्पन्न कर्म है।
व्याख्या
कृष्ण चार वर्णों का वर्णन पूरा कर रहे हैं, जिन्हें वे तीन गुणों (प्रकृति के तत्त्वों) से बने स्वभाव से जोड़ते हैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय के कर्मों के बाद यहाँ वैश्य का कर्म (खेती, गोपालन, व्यापार) और शूद्र का कर्म (सेवा, परिचर्या) बताया गया है। पारंपरिक भाष्यकार इन्हें जन्म से निर्धारित कर्म मानते हैं, जबकि कई आधुनिक पाठक कहते हैं कि यहाँ बात स्वभाव से उपजे कर्म की है, किसी के मूल्य की नहीं।