यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥
yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam |atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam ||
परंतु जो ज्ञान किसी एक ही कार्य में इस तरह आसक्त रहता है मानो वही सब कुछ हो, जो किसी तर्क पर आधारित नहीं है, जिसमें वास्तविकता की समझ नहीं है और जो तुच्छ है, उसे तामस कहा गया है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ज्ञान के तीन प्रकार बता रहे हैं। तामस ज्ञान जड़ और अंधकारमय है: वह किसी एक वस्तु या कर्म को ही सब कुछ मान लेता है, उसके पीछे कोई तर्क नहीं होता और वह वस्तुओं के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझता। यह सात्त्विक और राजस ज्ञान से भिन्न है, जिनका वर्णन पिछले दो श्लोकों में है।