निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥
niścayaṃ śrṛṇu me tatra tyāge bharatasattama |tyāgo hi puruṣavyāghra trividhaḥ saṃprakīrtitaḥ ||
हे भरतश्रेष्ठ, इस त्याग के विषय में मेरा निश्चित मत सुनो। हे पुरुषों में व्याघ्र, त्याग वास्तव में तीन प्रकार का बताया गया है।
व्याख्या
अर्जुन ने त्याग के बारे में पूछा है, और कृष्ण ने अभी बताया कि विद्वानों में मतभेद है: कुछ सब कर्म दोषयुक्त मानकर छोड़ने को कहते हैं, तो कुछ यज्ञ, दान और तप को न छोड़ने को। यहाँ वे अपना निश्चित मत (निश्चय) बताने लगते हैं और कहते हैं कि त्याग तीन प्रकार का है। आगे के श्लोकों में इसे तीन गुणों (प्रकृति के गुण) के आधार पर समझाया गया है।