अहंकार, बल, घमंड, कामना, क्रोध और संग्रह को छोड़कर, ममता से रहित और शांत हुआ व्यक्ति ब्रह्म-भाव को पाने के योग्य हो जाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ 18.51 से चल रहा उस व्यक्ति का वर्णन पूरा करते हैं जो मुक्ति के योग्य बनता है। ऐसा व्यक्ति अहंकार, बल (दबाव या ज़ोर), दर्प (घमंड), काम (कामना), क्रोध और परिग्रह (संग्रह) को छोड़ देता है, इसलिए ममता-रहित (निर्मम) और शांत रहता है। ब्रह्म परम सत्य है; अद्वैत परंपरा “ब्रह्मभूय” को ब्रह्म से अपनी एकता का साक्षात्कार मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे मुक्ति की ऐसी अवस्था मानती हैं जो आगे कृष्ण-भक्ति तक ले जाती है, जैसा अगले श्लोक में संकेत है।