इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥
idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana |na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo'bhyasūyati ||
यह उपदेश तुम्हें कभी भी ऐसे व्यक्ति को नहीं सुनाना चाहिए जिसमें तप नहीं है, जो भक्त नहीं है, जो सुनना नहीं चाहता, या जो मुझमें दोष निकालता है।
व्याख्या
गीता के अंत में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह उपदेश किन्हें नहीं सुनाना चाहिए। वे चार प्रकार के लोग गिनाते हैं: जिनमें तप (संयम) नहीं है, जिनमें भक्ति नहीं है, जो सुनना नहीं चाहते, और जो कृष्ण से द्वेष रखते हैं। सामान्यतः इसका आशय यह माना जाता है कि ऐसा उपदेश वहीं फल देता है जहाँ खुलापन और आदर हो; इन शर्तों को कितनी कठोरता से लिया जाए, इस पर परंपराओं में भिन्न मत हैं।