न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ |sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ ||
पृथ्वी पर, या फिर स्वर्ग में देवताओं के बीच भी, ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों से मुक्त हो।
व्याख्या
सुख के तीन प्रकार बताने के बाद कृष्ण दायरा बढ़ाते हैं: मनुष्य हों या देवता, हर प्राणी प्रकृति के तीन गुणों यानी सत्त्व, रजस और तमस से बँधा है। इस श्लोक में 'सत्त्व' शब्द का अर्थ 'प्राणी' या 'सत्ता' है, इसी नाम का गुण नहीं। यह बात अगले श्लोक की भूमिका बनाती है, जहाँ कर्मों का विभाजन इन्हीं गुणों के अनुसार बताया गया है।