शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
śamo damastapaḥ śaucaṃ kṣāntirārjavameva ca |jñānaṃ vijñānamāstikyaṃ brahmakarma svabhāvajam ||
मन की शांति, इंद्रियों पर संयम, तप, पवित्रता, क्षमा और सरलता, ज्ञान, अनुभवजन्य समझ और ईश्वर में आस्था: ये ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न कर्म हैं।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि मनुष्य के अपने स्वभाव के गुणों के अनुसार कर्म कैसे बँटे हैं। यहाँ वे ब्राह्मण-कर्म के लक्षण गिनाते हैं: शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान (अनुभवजन्य समझ) और आस्तिकता। पारंपरिक भाष्यकार इसे जन्मजात प्रकृति के आधार पर विभाजन मानते हैं, जबकि कुछ आधुनिक पाठक इसे जन्म-आधारित स्थिति नहीं, बल्कि चरित्र के गुणों का वर्णन मानते हैं।