tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ |paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ ||
ऐसा होने पर भी, जो व्यक्ति अपनी अशिक्षित बुद्धि के कारण केवल आत्मा को ही कर्ता मानकर देखता है, वह दुर्बुद्धि वास्तव में नहीं देखता।
व्याख्या
कृष्ण ने पिछले श्लोक में कर्म के पाँच कारण बताए थे: शरीर, कर्ता, साधन, चेष्टाएँ और दैव। यहाँ वे कहते हैं कि जो केवल आत्मा को ही कर्ता समझता है, उसकी बुद्धि अप्रशिक्षित (अकृतबुद्धि) है और वह पूरा सत्य नहीं देखता। परंपराओं में जोर अलग है: अद्वैत व्याख्या कहती है कि शुद्ध आत्मा कुछ करती ही नहीं, जबकि भक्तिपरक व्याख्या ईश्वर को भी कारणों में गिनती है।