adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca |nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ||
जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, जो सबका मित्र और करुणावान है, जिसमें "मेरा" का भाव और अहंकार नहीं है, जो दुःख और सुख में समान रहता है और क्षमाशील है…
व्याख्या
अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में कृष्ण अब अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताना शुरू करते हैं। इस श्लोक में हृदय के गुण गिनाए गए हैं: द्वेष का अभाव, मित्रता, करुणा, ममता और अहंकार से मुक्ति, सुख-दुःख में समभाव और क्षमा। यह वर्णन अगले श्लोक में भी जारी रहता है।