सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
santuṣṭaḥ satataṃ yogī yatātmā dṛḍhaniścayaḥ |mayyarpitamanobuddhiryo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
जो सदा संतुष्ट रहता है, जो योगी है, जिसने स्वयं को वश में कर रखा है, जिसका निश्चय दृढ़ है और जिसने अपना मन और बुद्धि मुझे अर्पित कर दी है — मेरा ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
व्याख्या
कृष्ण उस भक्त के गुण बताते जा रहे हैं जो उन्हें प्रिय है। ऐसा भक्त सदा संतुष्ट, संयमी और दृढ़ निश्चयी होता है, और अपना मन तथा बुद्धि कृष्ण को समर्पित कर देता है। 'योगी' का अर्थ साधना में लगा हुआ व्यक्ति है; कुछ परंपराएँ इसे भक्त के अर्थ में लेती हैं, तो कुछ ज्ञान या ध्यान के साधक के अर्थ में।