एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते ।येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate |yecāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥ ||
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आपकी उपासना करते हैं, और जो अविनाशी, अव्यक्त की उपासना करते हैं — इन दोनों में योग को अधिक जानने वाले कौन हैं?
व्याख्या
पिछले अध्याय में विश्वरूप देखने के बाद अर्जुन पूछते हैं कि योग (आध्यात्मिक साधना) में कौन अधिक स्थित है: वे भक्त जो सगुण रूप में कृष्ण की उपासना करते हैं, या वे जो अविनाशी, अव्यक्त तत्त्व का निराकार ध्यान करते हैं। यही प्रश्न इस पूरे अध्याय की भूमिका है, जिसका उत्तर कृष्ण आगे देते हैं।