अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥
anapekṣaḥ śucirdakṣa udāsīno gatavyathaḥ |sarvārambhaparityāgī yo madbhaktaḥ sa me priyaḥ ||
जो किसी अपेक्षा से रहित है, शुद्ध है, कुशल है, निष्पक्ष है, व्यथा से मुक्त है और सभी उद्यमों का त्याग कर चुका है — मेरा ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।
व्याख्या
कृष्ण अपने प्रिय भक्त का वर्णन जारी रखते हैं। ऐसा व्यक्ति फल की कोई अपेक्षा नहीं रखता (अनपेक्ष), भीतर-बाहर से शुद्ध और कुशल होता है, तटस्थ (उदासीन) रहता है और व्यथा से मुक्त होता है। "सर्वारम्भपरित्याग" को कुछ परंपराएँ स्वार्थपूर्ण, फल-प्रेरित उद्यमों का त्याग मानती हैं, तो कुछ कर्ता होने के भाव का त्याग, भले ही कर्म चलता रहे।