यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
yo na hṛṣyati na dveṣṭi na śocati na kāṅkṣati |śubhāśubhaparityāgī bhaktimānyaḥ sa me priyaḥ ||
जो न हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कामना करता है, जिसने शुभ और अशुभ दोनों का त्याग कर दिया है और जो भक्ति से भरा है, वह मुझे प्रिय है।
व्याख्या
कृष्ण उस भक्त का वर्णन जारी रखते हैं जो उन्हें प्रिय है, जैसा अर्जुन ने अध्याय के आरंभ में पूछा था। ऐसा व्यक्ति न किसी बात पर हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है और न कुछ चाहता है, इसलिए उसका मन स्थिर रहता है। 'शुभाशुभ का त्याग' को कुछ परंपराएँ अनुकूल-प्रतिकूल घटनाओं और कर्मफलों से न बँधना मानती हैं, तो कुछ शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों का संन्यास।