समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥
samaḥ śatrau ca mitre ca tathā mānāpamānayoḥ |śītoṣṇasukhaduḥkheṣu samaḥ saṅgavivarjitaḥ ||
जो शत्रु और मित्र के प्रति समान रहता है, वैसे ही मान और अपमान में भी; जो सर्दी-गर्मी और सुख-दुख में सम रहता है, और आसक्ति से मुक्त है…
व्याख्या
कृष्ण उस भक्त के गुण गिना रहे हैं जो उन्हें प्रिय है, और यह वर्णन आगे के श्लोक में भी चलता है। यहाँ वे विपरीत स्थितियों में मन की समता पर ज़ोर देते हैं: मित्र और शत्रु, मान और अपमान, सर्दी और गर्मी, सुख और दुख। इस स्थिरता की जड़ आसक्ति (सङ्ग) से मुक्ति है, यानी सुखद से चिपकना नहीं और अप्रिय को दूर धकेलना नहीं।