ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते ।सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
ye tvakṣaramanirdeśyamavyaktaṃ paryupāsate |sarvatragamacintyaṃ ca kūṭasthamacalaṃ dhruvam ||
परन्तु जो लोग उस अविनाशी, अनिर्वचनीय, अव्यक्त, सर्वव्यापी, अचिन्त्य, सदा एकरूप रहने वाले, अचल और अटल तत्त्व की उपासना करते हैं…
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा है कि सगुण कृष्ण के भक्त श्रेष्ठ हैं या निराकार अक्षर के उपासक। श्रद्धा से मन को अपने में लगाने वालों की प्रशंसा करने के बाद कृष्ण अब दूसरे मार्ग का वर्णन करते हैं, जिसमें उस अविनाशी (अक्षर) की उपासना होती है जो शब्द, रूप और विचार से परे है। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ इस मार्ग का फल बताया गया है। दोनों मार्गों के महत्त्व पर परंपराओं में मतभेद है: अद्वैत व्याख्याएँ इसे परम ज्ञान मानती हैं, जबकि भक्ति-परंपराएँ इस पर बल देती हैं कि कृष्ण इसे कठिन बताते हैं।