क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
kleśo'dhikatarasteṣāmavyaktāsaktacetasām |avyaktā hi gatirduḥkhaṃ dehavadbhiravāpyate ||
जिनका चित्त अव्यक्त में आसक्त है, उनके लिए कष्ट कहीं अधिक होता है; क्योंकि देहधारियों को अव्यक्त की प्राप्ति बड़ी कठिनाई से होती है।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि साकार रूप में कृष्ण के भक्त श्रेष्ठ हैं या अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म के उपासक। उत्तर में कृष्ण कहते हैं कि अव्यक्त का मार्ग अधिक कठिन है, क्योंकि देहधारी (देहवत्) जीव शरीर और इन्द्रियों से बँधा होने के कारण निराकार में मन टिकाने में बहुत कष्ट पाता है। व्याख्याएँ भिन्न हैं: भक्ति-परंपराएँ इसे साकार भक्ति के पक्ष में पढ़ती हैं, जबकि अद्वैत की दृष्टि इसे मार्ग की कठिनाई की स्वीकृति मानती है, उसका निषेध नहीं।