यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
yasmānnodvijate loko lokānnodvijate ca yaḥ |harṣāmarṣabhayodvegairmukto yaḥ sa ca me priyaḥ ||
जिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो स्वयं संसार से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, असहनशीलता, भय और घबराहट से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।
व्याख्या
कृष्ण अपने प्रिय भक्त के लक्षण बताना जारी रखते हैं। ऐसा व्यक्ति न किसी को कष्ट देता है, न दूसरों से विचलित होता है, और हर्ष, असहिष्णुता या क्रोध (अमर्ष), भय तथा घबराहट (उद्वेग) के उतार-चढ़ाव से मुक्त रहता है। यह श्लोक संसार के साथ व्यवहार में भीतरी स्थिरता की ओर संकेत करता है।