हे पार्थ, जिनका चित्त मुझमें लगा हुआ है, उन्हें मैं मृत्यु से भरे संसार-सागर से शीघ्र ही उबार लेता हूँ।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से उन भक्तों की बात कर रहे हैं जो अपने सब कर्म उन्हें अर्पित करके एकनिष्ठ योग (साधना) से उनका ध्यान करते हैं। वे वचन देते हैं कि ऐसे भक्तों को वे स्वयं जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) रूपी सागर से शीघ्र पार लगा देते हैं। भक्ति परंपराएँ इसे ईश्वर की कृपा से उद्धार मानती हैं, जबकि अद्वैत व्याख्या इसे मुक्तिदायक ज्ञान का उदय समझती है।