मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥
mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya |nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥ ||
अपना मन केवल मुझमें ही लगाओ और अपनी बुद्धि को मुझमें स्थिर करो। इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन से अपने प्रति भक्ति की बात कर रहे हैं, जिसमें वे स्वयं को परम ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि सोचने और डगमगाने वाला मन (मनस्) और निर्णय करने वाली बुद्धि दोनों उन्हीं में लगाओ। फल यह बताया गया है कि अर्जुन उन्हीं में निवास करेंगे। इस निवास का अर्थ सगुण ईश्वर के साथ सान्निध्य है या गहरी एकता, इस पर परंपराओं में मतभेद है; श्लोक स्वयं इसे तय नहीं करता।