ye tu sarvāṇi karmāṇi mayi saṃnyasya matparāḥ |ananyenaiva yogena māṃ dhyāyanta upāsate ||
परन्तु जो लोग अपने सारे कर्म मुझमें समर्पित करके, मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानकर, अनन्य योग से मेरा ध्यान करते हुए मेरी उपासना करते हैं…
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा है कि देहधारियों के लिए अव्यक्त का मार्ग बहुत कठिन है। अब वे उन भक्तों का वर्णन करते हैं जो अपने सारे कर्म उन्हें अर्पित कर देते हैं, उन्हें ही परम लक्ष्य मानते हैं और अनन्य योग, यानी एकाग्र साधना, से उनका ध्यान करते हैं। कुछ व्याख्याकार इस समर्पण को कर्म करते हुए सब कुछ ईश्वर को अर्पित करना समझते हैं, तो कुछ कर्तापन के भाव का आंतरिक त्याग। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।