जो सभी इंद्रियों के समूह को भली-भाँति वश में करके, सब जगह सबके प्रति समान बुद्धि रखते हैं और सभी प्राणियों के हित में आनंद पाते हैं, वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं।
व्याख्या
अर्जुन ने पूछा था कि योग में कौन श्रेष्ठ है, सगुण कृष्ण के भक्त या अव्यक्त, अविनाशी ब्रह्म के उपासक। पिछले श्लोक में वर्णित उन उपासकों के बारे में कृष्ण कहते हैं कि जो इंद्रियों को वश में रखते हैं, सबमें समभाव (समबुद्धि) रखते हैं और सबके कल्याण में लगे रहते हैं, वे भी उन्हीं तक पहुँचते हैं। परंपराओं में इसे अलग-अलग ढंग से पढ़ा गया है: कुछ इसे अव्यक्त-मार्ग की पूर्ण मान्यता मानते हैं, तो कुछ इस पर बल देते हैं कि अगले श्लोक के अनुसार यह मार्ग अधिक कठिन है।