मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥
matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ |nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||
जो मेरे लिए कर्म करता है, मुझे ही परम लक्ष्य मानता है, मेरा भक्त है, आसक्ति से मुक्त है और किसी भी प्राणी से वैर नहीं रखता, वह मुझे प्राप्त होता है, हे पाण्डव।
व्याख्या
विश्वरूप दिखाने के बाद कृष्ण अध्याय के अंत में अर्जुन को बताते हैं कि उन्हें कौन प्राप्त करता है। वे पाँच गुण गिनाते हैं: उनके लिए कर्म करना, उन्हें परम लक्ष्य मानना, भक्ति, आसक्ति (सङ्ग) से मुक्ति और किसी प्राणी से वैर न रखना। भक्ति-परम्पराएँ भक्ति और समर्पण पर बल देती हैं, जबकि अन्य परम्पराएँ इसे निष्काम कर्म और समभाव द्वारा ज्ञान की ओर ले जाने वाला मानती हैं।