मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयाऽत्मानमव्ययम् ॥
manyase yadi tacchakyaṃ mayā draṣṭumiti prabho |yogeśvara tato me tvaṃ darśayā'tmānamavyayam ||
हे प्रभो, यदि आप मानते हैं कि मैं उसे देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, आप मुझे अपना अविनाशी स्वरूप दिखाइए।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी कृष्ण का ऐश्वर्यमय दिव्य रूप देखने की इच्छा प्रकट की है। यहाँ वह विनम्रता से जोड़ता है कि यदि कृष्ण उसे इसके योग्य समझें तभी दिखाएँ। वह उन्हें "योगेश्वर" यानी योग-शक्ति के स्वामी कहकर अपना अविनाशी (अव्यय) स्वरूप दिखाने की प्रार्थना करता है।