आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥
ākhyāhi me ko bhavānugrarūponamo'stu te devavara prasīda |vijñātumicchāmi bhavantamādyaṃna hi prajānāmi tava pravṛttim ||
मुझे बताइए, इस उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ, आपको नमस्कार है; प्रसन्न हो जाइए। मैं आदिस्वरूप आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं समझ पा रहा हूँ।
व्याख्या
अर्जुन विश्वरूप के जलते और सबको निगलते दृश्य से भयभीत है। वह प्रणाम करके पूछता है कि यह उग्र रूप कौन है, और मानता है कि वह इसकी प्रवृत्ति, यानी इसके कार्य या उद्देश्य, को नहीं समझ पा रहा। इसका उत्तर अगले श्लोक में कृष्ण देते हैं।