मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvodṛṣṭvā rūpaṃ ghoramīdṛṅmamedam |vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṃtadeva me rūpamidaṃ prapaśya ||
मेरे ऐसे इस भयंकर रूप को देखकर तुम न व्यथित हो, न भ्रमित। भय छोड़कर और प्रसन्न मन होकर तुम फिर मेरे उसी रूप को देखो।
व्याख्या
अर्जुन विश्वरूप के भयंकर दर्शन से घबरा गए हैं और उन्होंने कृष्ण का परिचित रूप फिर देखने की इच्छा जताई है। कृष्ण उन्हें आश्वस्त करते हैं कि भय और मोह छोड़ दें और उसी जाने-पहचाने रूप को फिर देखें। "उसी रूप" से कुछ परंपराएँ 11.46 में माँगा गया चतुर्भुज रूप समझती हैं, तो कुछ कृष्ण का सौम्य मानव रूप, जो अगले श्लोक में दिखता है।