देवताओं के ये समूह आप में प्रवेश कर रहे हैं। कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी स्तुति कर रहे हैं। "कल्याण हो!" कहकर महर्षियों और सिद्धों के समूह भरपूर स्तुतियों से आपका गुणगान कर रहे हैं।
व्याख्या
अर्जुन उस विश्वरूप का वर्णन कर रहे हैं जो कृष्ण ने उन्हें दिखाया है, और वे विस्मय तथा भय से भरे हैं। वे देखते हैं कि देवता उस रूप में प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भय से स्तुति कर रहे हैं, और महर्षि तथा सिद्ध (सिद्धि प्राप्त पुरुष) "स्वस्ति" यानी कल्याण की कामना करते हुए स्तोत्र गा रहे हैं। यह श्लोक उस दर्शन के भय और श्रद्धा, दोनों को दिखाता है।