त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।वेत्तासि वेद्यं च परं च धामत्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇastvamasya viśvasya paraṃ nidhānam |vettāsi vedyaṃ ca paraṃ ca dhāmatvayā tataṃ viśvamanantarūpa ||
आप ही आदिदेव हैं, आप सनातन पुरुष हैं। आप ही इस सम्पूर्ण विश्व के परम आश्रय हैं। आप ही जाननेवाले हैं, आप ही जानने योग्य हैं और आप ही परम धाम हैं। हे अनन्त रूपोंवाले! आपसे ही यह सारा विश्व व्याप्त है।
व्याख्या
विश्वरूप के दर्शन से अभिभूत अर्जुन कृष्ण की स्तुति जारी रखता है। वह उन्हें आदि दिव्य सत्ता (पुरुष, यानी परम चेतन तत्त्व), सबका अंतिम आधार, ज्ञाता और ज्ञेय दोनों, तथा सर्वव्यापी सत्य कहता है। परम धाम को कुछ परंपराएँ सगुण, व्यक्तिगत ईश्वर के रूप में और कुछ निर्गुण परम तत्त्व के रूप में समझती हैं।