अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वाभयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।तदेव मे दर्शय देव रूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito'smi dṛṣṭvābhayena ca pravyathitaṃ mano me |tadeva me darśaya deva rūpaṃprasīda deveśa jagannivāsa ||
जो पहले कभी नहीं देखा गया, उसे देखकर मैं हर्षित हूँ, फिर भी भय से मेरा मन काँप उठा है। हे देव, मुझे अपना वही पहले वाला रूप दिखाइए। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हो जाइए।
व्याख्या
अर्जुन ने अभी श्रीकृष्ण का विश्वरूप देखा है। वह चकित और आनंदित है, पर साथ ही भयभीत भी, इसलिए वह कृष्ण से अपने परिचित रूप में लौटने की प्रार्थना करता है। 'जगन्निवास' कहकर वह मानता है कि पूरा संसार उन्हीं में टिका है।